अकेला: एक डॉक्टर की अधूरी दास्तान
Created with Inkfluence AI
एक डॉक्टर की निजी जिंदगी, प्रेम और अकेलेपन की कथा
Table of Contents
- 1. 03 फरवरी का अनजान संदेश
- 2. सफेद दीवारों के बीच उम्मीद
- 3. “जान” शब्द से रात बदलती
- 4. हॉस्टल की छत पर बारिश
- 5. अफसर शब और खोया हुआ वर्तमान
Preview: 03 फरवरी का अनजान संदेश
A short excerpt from “03 फरवरी का अनजान संदेश”. The full book contains 5 chapters and 9,600 words.
पौने दो बजे के आसपास सरकारी अस्पताल का फिजियोथेरेपी विभाग जैसे आख़िरकार सांस लेना भूल गया था। टाइल्स के ऊपर से पोंछे की हल्की-सी सरसराहट अब भी कानों में चिपकी थी, और डॉ. शब तिवारी के हाथों में आज की गर्मी उतर रही थी - कभी लकवे के मरीज की उंगलियों को सहलाकर, कभी सायटिका के दर्द में जकड़ी कमर पर हाथ टिकाकर, कभी एक्सीडेंट वाले एक युवक की कांपती कलाई को पकड़कर। कमरे में फिजियो की मशीनों की स्थिर भनभनाहट थी, पर निकलते वक्त हवा में एक अलग ही भारीपन था - फिनाइल की गंध, ठंडी धातु की सोंधी-सी ठंड, और चाय की सूखी पत्तियों वाली कसक, जो उन्होंने दिन भर अपने कोट की जेब में वैसे ही दबा रखी थी जैसे किसी पुराने आदत को।
कमरे तक आते-आते उनकी चप्पलें कम आवाज़ करने लगीं। सीढ़ियों की सीढ़ी पर पैर टिकते ही शरीर ने याद दिलाया कि आज भी उन्होंने दर्द से हाथ मिलाया है - बस हाथों से नहीं, अपनी थकान से भी। किराए का छोटा-सा कमरा दरवाज़ा खोलते ही वही फिनाइल की गंध और किताबों की धूल छोड़कर सामने आ गया। दीवार पर टंगी मेडिकल किताबों के कोने झुक रहे थे, मेज़ पर उनका स्टेथॉस्कोप एक तरफ पड़ा था, और चाय की सूखी पत्तियों वाला डिब्बा जैसे बेसब्री से खुलने का इंतज़ार करता हो। कमरे की रोशनी बहुत कम थी; बल्ब की पीली आभा में हर चीज़ धुंधली लगती - टूटे हुए दिन की तरह।
डॉ. शब ने स्टेथॉस्कोप को तौलिये से हल्के से साफ किया, फिर उसे वापस उसी जगह रख दिया। तकिये पर सिर रखते-रखते उनकी उंगलियां अपने आप मोबाइल की तरफ बढ़ीं - नींद से पहले की वही छोटी-सी रस्म। स्क्रीन जगते ही व्हाट्सएप के पुराने नोटिफिकेशन, अस्पताल के मैसेजों की लंबी चेन, और कुछ मिस्ड कॉल्स की सूखी सूची दिखी। उन्होंने बिना पढ़े ही सब बंद कर दिया, जैसे कुछ पढ़ने का मतलब फिर से उसी वार्ड में लौटना हो। “बस… सो जाना है,” उनके भीतर एक वाक्य उतर आया - सिर्फ एक वाक्य, और फिर चुप्पी।
उसी चुप्पी में, तकिये के पास मोबाइल ने एक हल्की-सी कंपन की - इंस्टाग्राम की नोटिफिकेशन। अजनबी आईडी। नाम नहीं, बस एक प्रोफाइल-सा खालीपन। डॉ. शब ने स्क्रीन देखा तो दिल एक बार के लिए अटक गया; फिर भी उन्होंने खुद को संभाल लिया, जैसे हर बार संभालते हैं - दर्द के सामने पेशेवर, रात के सामने इंसान। मैसेज एक ही था, छोटा-सा, लेकिन शब्दों में किसी ने उँगली रख दी थी - “jaag rhe ho?”
उन्होंने बिना आवाज़ किए सांस निकाली। कमरे में सिर्फ पंखे की धीमी खड़खड़ाहट थी और उनकी उंगलियों के पोरों में पसीना सूख रहा था। उन्होंने मैसेज पर टैप किया - टाइपिंग का निशान नहीं था, न कोई और लाइन। जैसे संदेश भेजकर सामने वाले ने जानबूझकर दूरी छोड़ दी हो। डॉ. शब ने एक बार नंबर देखने की कोशिश की, फिर खुद पर हँसने की तरह उन्होंने सोचा - इंस्टाग्राम पर रात में कौन… और फिर उनकी नींद की कोशिश फिर से करवट बदलने लगी।
उनके मन में तुरंत अस्पताल की गलियारे उभर आए - लकवा के मरीज की उँगलियों की जकड़न, सायटिका के दर्द में आंखों का डर, और एक्सीडेंट वाले युवक के शरीर में दर्द की विद्रोही गर्मी। आज उन्होंने एक बेटी की उम्मीद को भी संभाला था - वार्ड में एक महिला ने कांपती आवाज़ में कहा था कि उसके घर में अभी भी बच्चे की आवाज़ सुननी है, और डॉ. शब ने अपने शांत चेहरे से उसे उम्मीद की डोर थाम दी थी। उस उम्मीद के बीच उनकी अपनी टूटन कहीं दबकर बैठी थी - किसी और को दिखती नहीं, पर भीतर की दीवारों पर धड़कती रहती है।
“कौन हो तुम?” शब्द उन्होंने नहीं बोले, पर उनका गला पूछ ही रहा था। उन्होंने मोबाइल उठाकर लाइट कम की, स्क्रीन की रोशनी तकिये पर फैली तो फिनाइल की गंध और भी तीखी लगने लगी। उनकी आँखें संदेश पर टिक गईं। “jaag rhe ho?” जैसे कोई दरवाज़ा खोलकर अंदर झाँक रहा हो - बिना दस्तक, बिना पहचान। डॉ. शब ने रिप्लाई करने की कोशिश नहीं की। उंगलियां रुक गईं। उन्हें डर था कि अगर उन्होंने जवाब दिया, तो रात उनके कमरे में नहीं - उनके भीतर भी घुस आएगी।
फिर भी बेचैनी बढ़ती गई। उन्होंने इंस्टाग्राम पर उस आईडी के प्रोफाइल को खोलकर देखा - कुछ फोटो, कुछ पुराने पोस्ट, और एक लाइन जो पढ़ने लायक नहीं थी। डॉ. शब की अंगुलियां स्क्रॉल करती रहीं, पर दिमाग समझ नहीं पा रहा था कि यह परिचित किस भाव से जुड़ रहा है। मैसेज सिर्फ एक सवाल था; पर सवाल के पीछे जो सन्नाटा था, वह उनके लिए जाना-पहचाना था। वही सन्नाटा, जो 2 बजे के बाद कमरे में फैलता है, जब किसी की सांस पास नहीं होती और फिर भी दिल चाहता है किसी के होने का सबूत।
उन्होंने मोबाइल साइड में रखा, जैसे उसे दूर कर देंगे तो बेचैनी भी दूर हो जाएगी। पर नींद लौटने के नाम पर फिर से वही आवाज़ कानों में गूंजने लगी - “jaag rhe ho?” जैसे कोई कह रहा हो, “मैं भी जाग रही हूँ।” यह सोचते ही उनकी आंखों में हल्की गर्मी आई, पर उन्होंने पलकों को झुकाकर उसे रोक लिया। उनके कमरे में ठंडी चादर ने कंधों पर हल्का-सा सिकुड़न छोड़ दिया। उन्होंने कम्बल खींचा, फिर उठकर चाय की सूखी पत्तियों वाले डिब्बे को देखा - पुरानी आदत। चाय बनानी नहीं थी, बस हाथ व्यस्त रखना था।
उधर से कोई खटखट नहीं हुई, पर मोबाइल की स्क्रीन फिर चमक उठी। उसी आईडी से एक और नोटिफिकेशन। इस बार मैसेज नहीं आया - बस एक रीड-सा निशान नहीं, बल्कि इंफो में छोटा-सा संकेत कि “देखा गया” या “ऑनलाइन” जैसा कुछ। डॉ. शब ने सांस रोककर स्क्रीन पर झांका। उस अजनबी की मौजूदगी ने कमरे को और छोटा कर दिया। उन्हें लगा जैसे पंखे की आवाज़ भी अब उनके खिलाफ चल रही है - टिक-टिक, टिक-टिक, जैसे कोई घड़ी किसी फैसले का इंतज़ार कर रही हो।
उन्होंने फिर से मैसेज पर लौटकर देखा। उँगली बार-बार उसी सवाल पर टिकती रही। “रात को डॉक्टर जागता है,” उनके मन ने खुद को समझाने की कोशिश की। “ड्यूटी के बाद बस थकान रहती है।” पर ये समझाना भी झूठ नहीं था, फिर भी अधूरा था। क्योंकि यह मैसेज सिर्फ थकान का नहीं था - यह अकेलेपन को छूता था। डॉ....
About this book
"अकेला: एक डॉक्टर की अधूरी दास्तान" is a fiction book by Manu Mehra with 5 chapters and approximately 9,600 words. एक डॉक्टर की निजी जिंदगी, प्रेम और अकेलेपन की कथा.
This book was created using Inkfluence AI, an AI-powered book generation platform that helps authors write, design, and publish complete books. It was made with the AI Novel Writer.
Frequently Asked Questions
What is "अकेला: एक डॉक्टर की अधूरी दास्तान" about?
एक डॉक्टर की निजी जिंदगी, प्रेम और अकेलेपन की कथा
How many chapters are in "अकेला: एक डॉक्टर की अधूरी दास्तान"?
The book contains 5 chapters and approximately 9,600 words. Topics covered include 03 फरवरी का अनजान संदेश, सफेद दीवारों के बीच उम्मीद, “जान” शब्द से रात बदलती, हॉस्टल की छत पर बारिश, and more.
Who wrote "अकेला: एक डॉक्टर की अधूरी दास्तान"?
This book was written by Manu Mehra and created using Inkfluence AI, an AI book generation platform that helps authors write, design, and publish books.
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